सदियों पहले की बात हैं
भारत में संगीत के माध्यम से ध्यान लगाने की परंपरा थी।
दरअसल, व्यवस्थित सुर-ताल न केवल हमारे दिमाग को झंकृत करते हैं,
बल्कि पूरे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं,
जिससे हमारा मन एकाग्रचित्त हो जाता है।
इसलिए संगीत के महत्व का जितना भी बखान किया जाए कम ही होगा।
ध्यान, धारणा और समाधि संगीत के माध्यम से शीघ्र सधते हैं।
संगीतमय है सृष्टि
पूरी सृष्टि में नैसर्गिक संगीत व्याप्त है।
ऊंकी ध्वनि पूरे ब्रह्मांड में गुंजायमान होती है।
ध्यान की अवस्था में साधक को यह संगीत स्पष्ट रूप से सुनाई पडती है।
मैंने यह खुद अनुभव किया हैं
प्रकृति में हम जहां भी नजर दौडाते हैं,
वहां हमें संगीत ही संगीत सुनाई देता है।
नदी की कल-कल करती धारा में,
जल-प्रपातों के प्रवाह में,
कोयल की कुहु-कुहुमें,
पपीहेके पीहु-पीहुमें,
वायु के सुमधुर संचार में,
मोरों के पीऊ-पीऊमें,
भोर के समय पक्षियों के कलरव में,
कमल पुष्पों पर भौरोंके गुंजनआदि में
यह सब संगीत नहीं तो और क्या है?
भारत में संगीत के माध्यम से ध्यान लगाने की परंपरा थी।
दरअसल, व्यवस्थित सुर-ताल न केवल हमारे दिमाग को झंकृत करते हैं,
बल्कि पूरे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं,
जिससे हमारा मन एकाग्रचित्त हो जाता है।
इसलिए संगीत के महत्व का जितना भी बखान किया जाए कम ही होगा।
ध्यान, धारणा और समाधि संगीत के माध्यम से शीघ्र सधते हैं।
संगीतमय है सृष्टि
पूरी सृष्टि में नैसर्गिक संगीत व्याप्त है।
ऊंकी ध्वनि पूरे ब्रह्मांड में गुंजायमान होती है।
ध्यान की अवस्था में साधक को यह संगीत स्पष्ट रूप से सुनाई पडती है।
मैंने यह खुद अनुभव किया हैं
प्रकृति में हम जहां भी नजर दौडाते हैं,
वहां हमें संगीत ही संगीत सुनाई देता है।
नदी की कल-कल करती धारा में,
जल-प्रपातों के प्रवाह में,
कोयल की कुहु-कुहुमें,
पपीहेके पीहु-पीहुमें,
वायु के सुमधुर संचार में,
मोरों के पीऊ-पीऊमें,
भोर के समय पक्षियों के कलरव में,
कमल पुष्पों पर भौरोंके गुंजनआदि में
यह सब संगीत नहीं तो और क्या है?
जीवन में संगीत होना जरूरी है और हम सब अपना सुरीपन बनाये रखें, कभी भी अपने जीवन को बेसुरा न होने दें, यही कामना है।
जवाब देंहटाएंउत्तम पोस्ट, बधाई पहली पोस्ट के लिए
आपका आभार .... सुनील जी , हौसला बढ़ाने के लिए
हटाएं.
जवाब देंहटाएंनदी की कल-कल करती धारा में,
जल-प्रपातों के प्रवाह में,
कोयल की कुहु-कुहु में,
पपीहे के पीहु-पीहु में,
वायु के सुमधुर संचार में,
मोरों के पीऊ-पीऊ में,
भोर के समय पक्षियों के कलरव में,
कमल पुष्पों पर भौरों के गुंजन आदि में
वाऽऽह वाऽऽहऽऽ… … …
यह सब संगीत ही तो है…
निवेदिता जी !
सुंदर रचना है …
लेकिन एक ही क्यों है ?
नई रचना की प्रतीक्षा में…
:)
दीवाली की अग्रिम शुभकामनाओं सहित…
राजेन्द्र स्वर्णकार
आपका बहुत आभार ....
हटाएंवाह राजे
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